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जलवायु परिवर्तन मानवता के भविष्य के और जीवन समर्थन प्रणालियों के लिये सबसे बड़ी चुनौती...

किसी भी विषय को जब हम राष्ट्रीय अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर एक दिवस के रूप में मनाने लगते हैं तब कुछ कुछ उसके महत्व का उसके भयावह होते स्वरूप का स्तर समझ में आने लगता है | ये सारे नम दिवस, पृथ्वी दिवस, पर्यावरण दिवस, जल दिवस पक्षी दिवस इसी की ओर संकेत कर रहे हैं कि प्राकृतिक असंतुलन ने धीरे धीरे हवाओं के रूख को मुड़ने के लिए बाध्य कर दिया है और परिवर्तन स्पष्टतः परिलक्षित होने लगा है | प्राकृतिक असंतुलन के फलस्वरूप जलवायु परिवर्तन को हम तीन शब्दों में ही समेट सकते हैं अल्पवृष्टि, अतिवृष्टि और अनावृष्टि अर्थात कहीं कम, कहीं अति और कहीं वर्षा ही नहीं | ध्यान से देंखे तो भूमण्डल पर ये तीनों ही स्थितियाँ कहीं न कहींं जीवन समर्थित प्रणालियों के लिये सबसे बड़ी चुनौती बन कर सुरसा की तरह मुँह खोले निगलने को तैयार खड़ी हैं |


ये प्राकृतिक असंतुलन है क्या? प्रकृति तो नियमित प्रक्रिया से बंधी है | सूरज वैसे ही अपनी ऊर्जा और रोशनी प्रदान कर रहा है  |चाँद ,तारे, पृथ्वी सब अपनी निश्चित परिधि में परिक्रमा कर रहे हैं| पर पृथ्वी पर ऐसा क्या हो रहा है कि हवाओं ने हमसे रूठ कर मुंह मोड़ना शुरू कर दिया | क्या इसके जिम्मेदार हम स्वयं नहीं हैं ?  हमारी दिनोंदिन बढ़ती हुई  आकांक्षायें, अपेक्षायें, हमारी सोच ,हमारी प्रवृत्तियाँ ? कितना कुछ दिया हमें प्रकृति ने पर और अधिक पाने की लालसा में हम उस व्यक्ति की तरह हो गये जो सोने का अंडा देने वाली मुर्गी  का पेट फाड़कर एक साथ ही ख़जाना प्राप्त कर लेना चाहता है |


प्राकृतिक संसाधनों के अंधाधुंध दोहनऔर अंतरिक्ष तक छलाँग लगा कर वहाँ पहुंचने की होड़ ने हमें हमारे ही घर से बेघर कर दिया है | वन संपदा नष्ट हो रही है | वन में रहने वाले पशु -पक्षी और वनज वस्तुओं पर अवलंबित प्राणी आँखों के सामने अपना घरौंदा उजड़ने की यंत्रणा सहन कर रहे हैं |


वर्षा लाने वाले वृक्ष सूखे ठूँठ खड़े हैं और कहीं वो भी नहीं हैं | बारिश कहीं है ही नहीं ,कहीं है तो उसकी गति को नियंत्रित करने वाले वृक्ष  नहीं हैं | वृक्ष बारिश लाते भी हैं, रोकते भी हैं , उसे आदर सम्मान देकर ठहराते भी हैं |


प्रकृति और मानव अन्योन्याश्रित हैं | हम भूल जाते हैं कि सकल प्राणी  समाज भी एक दूसरे का पूरक है | जलवायु परिवर्तन से नदियों का जलस्तर  गिरावट पर है ,प्राचीन जलस्रोत सूखे पड़े हैं ,कुँये बाबड़ियाँ हमारी ही अनदेखी से अतीत का हिस्सा बन रहे हैं |


अतिवृष्टि में भयंकर बाढ़ें जनजीवन को अस्तव्यस्त कर देती हैं  ऐसी आपात् स्थिति में सामाजिक मर्यादायें भी असंतुलित हो मानवीय रिश्तों को ताक पर रख दरिंदगी का तांडव  करती दृष्टिगत होती हैं |केदारनाथ त्रासदी को लोग अभी भुला नहीं पाये हैं |


चेतावनी है कि बढ़ती ग्लोबल वार्मिंग के कारण संभावित ग्रीनहाउस इफेक्ट पृथ्वी को हिमयुग की ओर न धकेल दे  |

अभी कुछ दिन पहले समाचार पत्रों में अंटार्कटिका क्षेत्र में एक मेंढक के जीवाश्म प्राप्त होने कीखबर छपी थी |अनुमान है कि करोड़ों वर्ष पूर्व यह क्षेत्र सघन वनों से आच्छादित  था जो कालान्तर में बर्फ की परतों में परिवर्तित हो गया | बृहदाकार सरीसृपों और विशालकाय डायनासोर्स  के यदा कदा प्राप्त जीवाश्म भी जलवायु के कारण होने वाले परिवर्तनों का प्रमाण देते हैं  | कवि जयशंकर प्रसाद के महाकाव्य 'कामायनी' के अनुसार जलप्रलय ने समस्त पृथ्वी को अपने आगोश में ले लिया था |अंतरिक्ष में सेंध लगाने की हमारी उत्कट अभिलाषा जिस तरह ओज़ोन आवरण को भेद सूर्य की पराबैंगनी किरणों को पृथ्वी पर आमंत्रित कर रही है वो दिन दूर नहीं होगा कि उत्तरी दक्षिणी  ध्रुवों पर जमी बर्फ के द्रवीकरण से समुद्रों का जलस्तर तटीय क्षेत्रों को निगल ले| यह भी जलप्रलय के ही उदाहरण होंगे |


प्रतिवर्ष कहर बरपाने वाली सुनामी भी मानव समर्थित जीवन प्रणालियों को तहस नहस कर जाती है |


नदियों पर बाँधे गये बाँधों और उनसे निकलने वाली नहरों ने एक ओर तो जनजीवन की सुविधाओं में वृद्धि की है वहीं दूसरी ओर रेगिस्तानी इलाकों की शुष्कता को आर्द्रता में बदल कर जलवायु परिवर्तन में मुख्य भूमिका निभाई है | वहाँ की आबोहवा, जीव जन्तुओं की जीवन शैली तथा आकार प्रकार में परिवर्तन तथा कुछ नये प्रकार के कीटों की उपस्थिति ने भी वैग्यानिकों के चौंका दिया है | दैत्याकार बाँधों के लिये अवाप्त  भूमि के कारण हुये लाखों विस्थापितों  का दर्द तो वे ही बयाँ कर सकते हैं |


जलवायु परिवर्तन ने हमारी धार्मिक सांस्कृतिक परम्पराओं की भी  जड़ें हिला दी हैं हम जो आँखें मूँदे विश्वास कर बैठे हुये थे कि ये परम्परागत जल स्रोत, ये खिलखिलाती जीवनदायिनी नदियाँ, आकाश छूती हिमाच्छादित पर्वतों की चोटियाँ, ऊँचे वृक्षों से गुम्फित सघन वन सदैव ही जीवन अवलम्ब  बने रहेंगे  कहीं ऐसा न हो कि सब जागती आँखों का स्वप्न भर रह जायें |काश! भारतीय धार्मिक सांस्कृतिक परम्पराओं में रचे बसे आँवला, नीम, तुलसी, बरगद, पीपल के वृक्षों के पूजन और जलस्रोतों में दीपदान करने के रीति रिवाजों के वैग्यानिक महत्व को भी हमारे संस्कारों में गूँथ दिया जाता तो ये दिन न देखने पड़ते |


विकास की अंधाधुंध दौड़ में सब हांफ रहे हैं और प्रकृति जैसे स्तब्ध खड़ी है | नि:संदेह हमने प्रकृति से छेड़छाड़ की है | प्रतिकार या प्रतिशोध कुछ तो हमें झेलना ही पड़ेगा | प्रकृति को हमने माँ माना है तो प्रतिशोध की कल्पना नहीं करेंगे बहुत भयावह है वो | प्रतिकार की तीव्रता को कम करने का प्रयत्न करना होगा |समवेत सामूहिक प्रयासों से क्रोधित हवाओं के रूख मोड़े जा सकते हैं | पर्यावरण संरक्षण, अधिक से अधिक वृक्षारोपण, गगनचुम्बी अट्टालिकाओं की भेंट चढ़ती वनभूमि को समेटने का प्रयास करना होगा | कृषि योग्य भूमि के रूपान्तरण को रोकना होगा | अंतरिक्ष में एक आशियाना तलाशने के स्थान पर अपनी धरती को ही स्वच्छ सुन्दर बनाना होगा | 


लक्ष्मी के स्वागत हेतु जलते असंख्य दियों में से ही कुछ दिये गांवों ढाँढियो की अँधेरी कोठरियों में भी अपना प्रकाश फैलायें |समृद्ध रसोइयों में पकने वाले स्वादिष्ट व्यंजनों का चूरा ही उन कोठरियों में पहुँच जाये  जहाँ रोज चूल्हा ही नहीं जलता.| भागीरथी प्रयास करके गंगा को एक बार फिर इस तपती जलती धरा की प्यास  बुझाने लाना होगा वो शिव की जटाओं में ही उलझ कर न रह जायें (ध्यान रहे ग्लेशियर्स लुप्त होने के संकेत हैं)  आशा की एक किरण अभी  चमकी है पर किस मूल्य पर |


वैश्विक महामारी कोविड 19 (COVID-19) के कारण हुये लॉकडाउन ने हमें आइना दिखा दिया है | एक महीने में ही पर्यावरण प्रदूषण का ग्राफ नीचे गिर गया है | वातावरण में छाई जहरीली गैसें प्राकृतिक रूप से  विलीन हो गईं | बर्फ से ढका हिमालय की चोटियाँ  दूर से ही नज़र आने लगीं  हैं | न दियाँ आश्चर्य जनक रूप से स्वच्छ हो गई हैं |ओज़ोन परत मे बढ़ता हुआ छिद्र भर गया है सूनी सड़कों पर मोर रंगबिरंगे पंखों को फैलाकर मनभावन नृत्य में लीन हैं  | काश हम इससे सबक लें |


आइये, एक हरी भरी वसुंधरा की कल्पना करें जहाँ नीले आसमान तले माथे पर कलश उठाये पनिहारिनों की खिलखिलाहटें अठखेलियाँ करती हों | हर घर में जलते चूल्हे से उठते धु़ँओं के बादलों में जीवन का सतरंगा इन्द्रधनुष जगमगाये |  महकते उपवनों में फूलों पर मँडराती तितलियों के पीछे भागते स्वस्थ सुन्दर बच्चों में मानवता का भविष्य सुरक्षित रहे एेसी कामना करें |


      थाल में नैवेद्य हो,जलकलश मंगल माथ हो,

      धानी चुनर में विहँसता उत्फुल्ल हृदय साथ हो |

      इस कामना के साथ,आओ संरक्षित करें वसुन्धरा,

        प्रतिदान में जीवन मिले,हर्षित धरा आकाश हों |

ABOUT THE AUTHOR:

Mrs. Rekha Sharma is the Director of  Little Angel Secondary School, Balchand Pada Bundi, Rajasthan.

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